कभी सोचा है आपकी असल पहचान क्या है ? ये जो आप घर में, समाज में और कार्यालय में अलग-अलग चेहरे ओढ़े घूमते हो क्या यही आपकीवास्तविक पहचान है? नहीं। और सच यह है कि यह बात आप स्वयं भी जानते हो। फिर भी आप उन चेहरों को ढोते रहते हो, जैसे वही आपका सत्य हों।
असल पहचान क्या है ?
जिसे ब्रह्म ने रचा है, वह इतना कमजोर नहीं हो सकता कि हर परिस्थिति के अनुसार अपना स्वरूप बदलता रहे। फिर भी तुम बदलते हो, क्योंकि तुमने जीना नहीं सीखा: तुमने स्वीकार किए जाना सीखा है। बचपन से तुम्हें सिखाया गया कि अच्छे बनो, विनम्र रहो, सबको खुश रखो। लेकिन किसी ने यह नहीं सिखाया कि अपने प्रति सच्चे कैसे रहना है। यहीं से पहचान का विघटन शुरू होता है।
धीरे-धीरे तुम वही बनते चले जाते हो, जो तुमसे अपेक्षित होता है। तुम्हारी पहचान अब तुम्हारी नहीं रह जाती, वह दूसरों की उम्मीदों का प्रतिबिंब बन जाती है। तुम्हारा व्यवहार समाज के हिसाब से ढलता है, तुम्हारे निर्णय स्वीकृति के आधार पर तय होते हैं और तुम्हारे शब्द इस डर से निकलते हैं कि कहीं अस्वीकार न कर दिए जाओ। इस प्रक्रिया में तुम खुद से इतने दूर चले जाते हो कि एक समय के बाद तुम्हें यह भी याद नहीं रहता कि तुम वास्तव में कौन थे।
समाज हमारी पहचान कैसे बनाता है
यहाँ एक कड़वी सच्चाई है: तुम नकली नहीं हो, तुम्हें नकली बना दिया गया है। तुम्हें इस तरह तैयार किया गया है कि तुम सवाल न पूछो, तुम अलग न दिखो और तुम उस व्यवस्था में फिट हो जाओ जिसे समाज ने सामान्य मान लिया है। धीरे-धीरे यह “फिट हो जाना” ही तुम्हारी पहचान बन जाता है। तुम इतने अभ्यस्त हो जाते हो कि तुम्हें अपना असली रूप असहज लगने लगता है।
कभी अकेले बैठकर अपने आप से बात करने की कोशिश करो। बिना किसी भूमिका के, बिना किसी दिखावे के। वहाँ एक अजीब सी खामोशी मिलेगी। क्योंकि वहाँ कोई चेहरा नहीं होता, वहाँ केवल तुम होते हो: और शायद वही तुम सबसे अनजान हो। यही वह बिंदु है जहाँ व्यक्ति को एहसास होता है कि उसने जीवन भर जो जिया, वह पूरी तरह उसका अपना नहीं था।
समस्या यह नहीं है कि तुमने चेहरे पहन रखे हैं, समस्या यह है कि तुमने उन्हें ही अपना चेहरा मान लिया है। तुम्हारी प्रतिक्रियाएँ अब स्वाभाविक नहीं रहीं, वे सीखी हुई हैं। तुम्हारे निर्णय स्वतंत्र नहीं हैं, वे प्रभावित हैं। और सबसे खतरनाक बात यह है कि तुम्हें यह सब सामान्य लगने लगा है।
अपनी वास्तविक पहचान वापस कैसे पाएँ
पहचान वापस पाना कोई सरल या सुखद प्रक्रिया नहीं है। यह असहज करती है, क्योंकि इसमें तुम्हें अपने ही बनाए हुए झूठों का सामना करना पड़ता है। पहला कदम है: अपने आप से ईमानदार होना। यह स्वीकार करना कि अब तक तुमने जो जिया, वह पूरी तरह तुम्हारा अपना नहीं था। इसके बाद हर उस भूमिका को परखना जरूरी है, जिसे तुम निभा रहे हो। यह पूछना कि क्या यह वास्तव में तुम्हारा स्वभाव है, या केवल एक आदत है जो तुमने परिस्थितियों के कारण विकसित की है।
धीरे-धीरे जब यह परतें हटने लगती हैं, तो भीतर दबा हुआ वास्तविक स्वरूप सामने आने लगता है। यह प्रक्रिया समय लेती है, लेकिन यही वह मार्ग है जो व्यक्ति को उसके मूल स्वरूप तक वापस ले जाता है। पहचान कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाहर खोजा जाए; यह वह है जिसे भीतर से पुनः प्राप्त करना होता है।
दुनिया को तुम्हारी असली पहचान से बहुत फर्क नहीं पड़ता। उसे तुम्हारा व्यवहार चाहिए, तुम्हारी उपयोगिता चाहिए, तुम्हारा प्रदर्शन चाहिए। लेकिन तुम्हें फर्क पड़ना चाहिए, क्योंकि अंततः सबसे बड़ा नुकसान असफलता नहीं है: सबसे बड़ा नुकसान है स्वयं को खो देना।
इसलिए दुनिया के सामने तुम जो भी बनो, वह तुम्हारा चुनाव हो सकता है। लेकिन कम से कम अपने सामने तो सच्चे रहो। क्योंकि दुनिया से छिपना आसान है, पर स्वयं से छिपकर जीना धीरे-धीरे भीतर से समाप्त हो जाने जैसा है।