क्या AI यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता सच में हमारी दुनिया बदल रही है, या हम अभी सिर्फ उसके शोर के बीच खड़े हैं? आज AI को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, शायद ही किसी दूसरी तकनीक को लेकर कभी हुई हो। हर तरफ एक ही बात सुनाई देती है। AI आएगा, काम आसान करेगा, नए अवसर देगा, व्यवसायों को बदलेगा और दुनिया को अगले स्तर पर ले जाएगा। लेकिन इस उत्साह और उम्मीद के बीच एक और भावना बहुत तेजी से बढ़ी है, और वह है अनिश्चितता। खासतौर पर उन लोगों के लिए जो नौकरी और तकनीक के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
प्रीतम साहू के साथ हुई यह बातचीत सिर्फ तकनीक के नए औज़ारों तक सीमित नहीं रही। इसमें नौकरी की चिंता थी, कारोबार की चुनौतियां थीं, सीखने का रास्ता था और यह सवाल भी था कि AI के बीच इंसान की भूमिका आखिर कैसी रहने वाली है।
प्रीतम साहू, PritamSahuAI के संस्थापक हैं और Google व Oracle जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियों के साथ लंबे समय तक काम कर चुके हैं। लेकिन उनकी बातों में सबसे अलग बात उनका ज़मीन से जुड़ा अनुभव है।
ओडिशा के एक छोटे शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय तकनीकी दुनिया तक पहुंचने का उनका सफर उनकी बातों को और भरोसेमंद बना देता है। शायद इसी वजह से यह बातचीत सिर्फ तकनीक तक नहीं रही, बल्कि उस भविष्य की की और इशारा करती है जो हमारे सामने तेजी से आकार ले रहा है।
बड़ी कंपनियों की छंटनी वास्तविक चिंता है
AI को लेकर जितना उत्साह है, उतनी ही चिंता भी है। प्रीतम ने शुरुआत इसी सच्चाई से की। उन्होंने कहा कि आज नौकरी को लेकर असुरक्षा कोई कल्पना नहीं है, बल्कि एक सच्ची भावना है जिसे हजारों लोग रोज महसूस कर रहे हैं।
Meta, Amazon, Microsoft और Google जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियों में लगातार लोगों की छंटनी हो रही है। कहीं नई भर्ती रुकी हुई है, कहीं टीमें बदली जा रही हैं और कई जगह कर्मचारियों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार रहने को कहा जा रहा है।

यह भय , यह सुगबुगाहट बाहर से सब सामान्य दिख सकता है, लेकिन भीतर अनिश्चितता बहुत गहरी है। कई लोग अब AI को सिर्फ एक नई तकनीक की तरह नहीं देख रहे। उनके मन में पहला सवाल यही है कि जो काम मैं आज कर रहा हूं, क्या उसे आने वाले समय में मशीन स्थान ले लेगी ? ?
छंटनी की असली वजह सिर्फ AI नहीं है
लोग अक्सर हर छंटनी को सीधे AI से जोड़ देते हैं, लेकिन प्रीतम इसके पीछे तीन और मुख्य वजह बताते हैं :
प्रीतम के अनुसार छंटनी की पहली वजह कोरोना के समय हुई जरूरत से ज्यादा भर्तियां को मानते हैं । उनके अनुसार उस समय कंपनियों ने बहुत तेजी से लोगों को जोड़ा था। अब वही फैसले कई जगह दबाव बन गए हैं।
उनके मुताबिक दूसरी वजह है स्वचालन। जहां बार-बार होने वाले काम मशीन संभाल सकती है, वहां टीम छोटी हो रही है।
वहीँ , तीसरी वजह है व्यापारिक रणनीति। प्रीतम का मानना है की कई कंपनियां निवेशकों को बेहतर नतीजे दिखाने के लिए ऐसे फैसले ले रही हैं। यानी तस्वीर सिर्फ इतनी नहीं है कि AI आया और लोग नौकरी से निकल गए। इसके पीछे बाज़ार की स्थिति, व्यापारिक दबाव और बदलती तकनीक सब साथ काम कर रहे हैं।
AI जितना ताकतवर है, उतना ही महंगा भी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता बाहर से बहुत आकर्षक दिखती है, लेकिन उसके पीछे लगने वाला खर्च बहुत बड़ा है। प्रीतम ने इस पर विस्तार से बात की। शक्तिशाली ग्राफिक प्रोसेसर, बड़े सर्वर, डेटा सेंटर, बिजली और तकनीकी ढांचा, इन सबको बड़े स्तर पर चलाना बेहद महंगा काम है। कई बार बहुत बड़ा निवेश होता है और फायदा तुरंत नहीं आता। यही वजह है कि कई कंपनियां लोगों की भर्ती बढ़ाने की बजाय तकनीकी ढांचे पर ज्यादा खर्च कर रही हैं। भारत जैसे देश में यह चुनौती और बड़ी हो जाती है, क्योंकि यहां AI बनाना सिर्फ तकनीक का नहीं, एक पूरा ईको सिस्टम और टिकाऊ व्यवस्था बनाने का भी सवाल है।
भारत में AI आधारित नया काम शुरू करना कितना आसान है?
भारत के बारे में प्रीतम का नजरिया बहुत संतुलित था। उन्होंने साफ कहा कि यहां प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। अच्छे विचार भी हैं और कुछ नया करने की इच्छा भी। लेकिन कागज़ी प्रक्रियाएं, नियम और कई व्यावहारिक रुकावटें आगे बढ़ने की रफ्तार धीमी कर देती हैं।
वे इस बात पर जोर देते हैं की हमारी अर्थव्यवस्था अभी भी सेवा आधारित है। इस्तेमाल ज्यादा है और गहरी खोज कम है। इसी वजह से कई प्रतिभाशाली लोग बाहर के बाज़ारों की तरफ चले जाते हैं। लेकिन उन्होंने उम्मीद भी जताई। अगर शुरुआत समझदारी से हो, किसी खास समस्या पर ध्यान दिया जाए और छोटे स्तर पर लगातार काम किया जाए, तो मजबूत और टिकाऊ काम खड़ा किया जा सकता है।
AI को जानना काफी नहीं, उससे समस्या सुलझाना जरूरी है
आज हर तरफ AI विशेषज्ञ दिखाई देते हैं। लेकिन प्रीतम ने यहां बहुत साफ बात कही। AI को जानना और AI की मदद से किसी असली समस्या का समाधान करना, दोनों अलग बातें हैं।
अगर आप सिर्फ नए औज़ार जानते हैं तो वह उपयोगी है। लेकिन अगर आप किसी ग्राहक की परेशानी कम कर सकते हैं, किसी काम को आसान बना सकते हैं या किसी खास समस्या का हल निकाल सकते हैं, तो वही आपकी असली ताकत बनती है। आने वाले समय में पहचान से ज्यादा महत्व काम का होगा।
30, 60 और 90 दिन का सीखने वाला रास्ता
बातचीत का सबसे काम का हिस्सा यही था। प्रीतम ने कहा कि AI सीखने के लिए खुद पर बहुत ज्यादा दबाव डालने की जरूरत नहीं है। पहले 30 दिन बुनियादी बातें समझिए। अगले 30 दिन किसी एक दिशा को चुनिए। उसके बाद अगले 30 दिन उस सीखी हुई चीज़ को असली काम में उतारिए। यह तरीका सीखने को आसान बनाता है और आगे बढ़ने का भरोसा भी देता है।
डिग्री से आगे निकल चुका है कौशल
एक और जरूरी बात बार-बार सामने आई कि डिग्री और प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन लंबे समय में फर्क कौशल बनाता है। आज दुनिया यह देख रही है कि आप किसी समस्या को कितनी अच्छी तरह समझते हैं और उसका समाधान कितनी मजबूती से कर सकते हैं। अगर आपके भीतर लगातार सीखने की आदत है और काम करके दिखाने की क्षमता है, तो यही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।
कुछ काम लंबे समय तक इंसानों के ही रहेंगे
AI बहुत कुछ बदल देगा, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन हर काम मशीन नहीं कर पाएगी। बिजली का काम करने वाले, पाइपलाइन ठीक करने वाले और ऐसे कई काम हैं जहां मौके पर समझ और हाथों से काम करने की जरूरत होती है। दूसरी तरफ नेतृत्व, मार्गदर्शन, रिश्ते बनाना और बातचीत जैसे काम ऐसे हैं जहां इंसान की मौजूदगी हमेशा सबसे ज्यादा मायने रखेगी। मशीन जवाब दे सकती है, लेकिन भरोसा इंसान ही बनाता है।
मार्गदर्शक क्यों आज भी सबसे जरूरी हैं
प्रतिस्पर्धा की दुनिया में सिर्फ मेहनत काफी नहीं होती। कई बार मेहनती लोग पीछे रह जाते हैं और राजनीति आगे निकल जाती है। कई बार सही प्रतिक्रिया नहीं मिलती। ऐसे समय में एक सच्चा मार्गदर्शक बहुत जरूरी हो जाता है। ऐसा इंसान जो सिर्फ हौसला न दे, बल्कि आपकी कमियां भी साफ बताए। कई बार सही समय पर मिला सही सुझाव किसी नई डिग्री से भी ज्यादा कीमती साबित होता है।
AI, पॉडकास्ट और इंसानी जुड़ाव की असली ताकत
बातचीत के आखिर में एक बहुत सुंदर बात सामने आई। AI कंटेंट बना सकता है, आवाज़ तैयार कर सकता है और दृश्य बना सकता है। लेकिन दो इंसानों के बीच जो सच्ची बातचीत होती है, उसकी गर्माहट अलग होती है। एक पॉडकास्ट में सिर्फ शब्द नहीं होते। उसमें भाव होते हैं, ठहराव होता है और सामने वाले की सच्चाई महसूस होती है। तकनीक कितनी भी आगे चली जाए, इंसानी जुड़ाव की कीमत बनी रहेगी।
AI से डरने का नहीं, उसके साथ आगे बढ़ने का समय है
पूरी बातचीत का सार अगर एक बात में कहना हो, तो शायद यही होगा। AI कोई थोड़े समय का चलन नहीं है। यह आने वाले समय की सबसे ताकतवर शक्तियों में से एक बनने जा रहा है। यह बदलाव भी लाएगा और नए अवसर भी देगा। खासकर उन लोगों के लिए जो सीखते रहेंगे, बदलाव को अपनाएंगे और तकनीक के साथ अपनी मानवीय ताकत को जोड़ना जानेंगे।
प्रीतम साहू की पूरी बातचीत शायद एक पंक्ति में यही कहती है। AI आपकी जगह लेने नहीं आया है। लेकिन अगर आप सीखना छोड़ देंगे, तो दुनिया जरूर आगे निकल जाएगी। इसलिए सवाल यह नहीं है कि AI आएगा या नहीं। सवाल सिर्फ इतना है कि जब यह दुनिया बदल रही होगी, तब आप खुद को कहां खड़ा देखना चाहते हैं।
प्रीतम साहू के साथ पूरा पॉडकास्ट यहाँ देखें :-
https://www.youtube.com/watch?v=-2olNUCoIZM