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अभिषेक व्यास

उद्यमी, लेखक और पॉडकास्टर।

उद्यमियों के लिए “वर्क लाइफ बैलेंस” एक भ्रम है

April 27, 2026

हमें बचपन से एक बात सिखाई जाती है कि जीवन को संतुलित रखना चाहिए। काम अलग होना चाहिए और निजी जीवन अलग। दिन का एक हिस्सा काम के लिए और बाकी समय अपने लिए। इसी को परिपक्वता माना जाता है, इसी को “जीवन संतुलन” कहा जाता है। यह मॉडल एक हद तक सही भी है, लेकिन यह हर व्यक्ति पर लागू नहीं होता। खासकर उन लोगों पर नहीं, जो केवल काम नहीं कर रहे होते, बल्कि कुछ रच रहे होते हैं।

उद्यमिता और “वर्क-लाइफ बैलेंस” की वास्तविकता

एक नौकरी करने वाला व्यक्ति शाम को दफ्तर से निकलता है और सचमुच अपने काम को पीछे छोड़ आता है। अगले दिन तक वह काम उसके दिमाग से बाहर हो सकता है। घर पहुँचकर वह पिता, दोस्त, पति या सिर्फ एक सामान्य इंसान बन जाता है। उसकी पहचान उसके काम से जुड़ी जरूर होती है, लेकिन पूरी तरह उसी में घुली हुई नहीं होती।

लेकिन एक उद्यमी के साथ ऐसा नहीं होता।

उसके लिए काम कोई ऐसी जगह नहीं है जिसे शाम के बाद बंद कर दिया जाए। वह हर समय उसके भीतर चलता रहता है। वह भोजन की मेज़ पर भी मौजूद होता है, छुट्टियों में भी और उन रातों में भी, जब शरीर सोना चाहता है लेकिन दिमाग किसी अधूरे विचार में उलझा रहता है। बाहर से देखने वाले लोगों को लगता है कि वह “बहुत काम” कर रहा है, लेकिन भीतर से सच कुछ और होता है। वह सिर्फ काम नहीं कर रहा होता, वह अपने ही किसी हिस्से को आकार दे रहा होता है।

यही कारण है कि एक उद्यमी अपनी संस्था से केवल पेशेवर रूप से नहीं जुड़ता। उसका रिश्ता भावनात्मक होता है। वह उसमें अपना अनुभव डालता है, अपनी असफलताएँ डालता है, अपने डर, अपनी जिद और अपने विश्वास तक उसमें मिला देता है। इसलिए उसके लिए संस्था सिर्फ आय या मूल्यांकन का खेल नहीं रह जाती। वह उसके भीतर की किसी अधूरी कहानी का विस्तार बन जाती है।

कई बार किसी उत्पाद की शुरुआत बाजार की कमी से नहीं होती। वह किसी व्यक्तिगत अनुभव से होती है। किसी ऐसी समस्या से, जिसे उस व्यक्ति ने खुद महसूस किया हो। किसी ऐसे खालीपन से, जिसे वह लंबे समय तक नजरअंदाज न कर पाया हो। इसलिए जब वह कुछ बना रहा होता है, तो असल में वह केवल एक व्यवसाय नहीं बना रहा होता, वह अपने अनुभवों को आकार दे रहा होता है।

यहीं से जीवन और काम के बीच की रेखा धीरे-धीरे मिटने लगती है।

Entrepreneurship in Hindi

दर्द, संघर्ष और निर्माण

एक उद्यमी के जीवन में जो कठिनाइयाँ आती हैं, वे उसके काम से अलग नहीं रहतीं। वे उसी काम का हिस्सा बन जाती हैं। कोई असफलता उसे भीतर से तोड़ती है, लेकिन वही असफलता उसके निर्णयों को अधिक गहरा बना देती है। कोई रिश्ता टूटता है, कोई विश्वास बिखरता है, और वही अनुभव उसकी सोच को बदल देता है। बाहर से देखने पर ये घटनाएँ व्यक्तिगत लगती हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे उसके काम की गुणवत्ता में उतरने लगती हैं।

इसीलिए उद्यमिता को केवल व्यवसाय की भाषा में समझना अधूरा है। यह भीतर की यात्रा भी है। यह केवल धन कमाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया भी है।

और शायद यही कारण है कि किसी सफल उद्यमी की वास्तव में नकल नहीं की जा सकती।

लोग अक्सर सोचते हैं कि सफलता उत्पाद में छिपी है। इसलिए वे वही उत्पाद बना लेते हैं, वही मूल्य तय कर लेते हैं, वही रणनीति तक अपनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन फिर भी वे वैसा नहीं बना पाते। क्योंकि उन्होंने केवल बाहरी चीजें देखीं, भीतर की यात्रा नहीं।

वे उस दर्द की नकल नहीं कर सकते, जिसने उस व्यक्ति को बदल दिया। वे उन असफलताओं की नकल नहीं कर सकते, जिन्होंने उसकी समझ को गहरा किया। वे उन रातों की नकल नहीं कर सकते, जब उसे खुद नहीं पता था कि वह सही कर रहा है या नहीं। और यही अनुभव अंत में सबसे बड़ी पूंजी बन जाते हैं।

इस यात्रा में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। न असफलता, न टूटन, न भ्रम, न भटकाव। हर अनुभव धीरे-धीरे उस चीज़ में जुड़ता जाता है जिसे आप बना रहे होते हैं। बिना शोर किए, बिना घोषणा किए, आपका काम आपकी कहानी बनना शुरू कर देता है। और शायद उद्यमिता की सबसे सच्ची परिभाषा यही है।

आप सिर्फ एक संस्था नहीं बना रहे होते। बल्कि आप अपने जीवन को एक आकार दे रहे होते हैं।