आज अगर कोई आपसे पूछे कि बिज़नेस शुरू करने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है, तो शायद ज्यादातर लोग बिना सोचे जवाब देंगे – पैसा।
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ उद्यमिता की कहानियाँ अक्सर करोड़ों की फंडिंग, बड़े निवेशकों और यूनिकॉर्न वैल्यूएशन के आसपास घूमती हैं। सोशल मीडिया पर सफलता का जो चेहरा दिखाई देता है, उसमें पूंजी को अक्सर सबसे बड़ी ताकत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। धीरे-धीरे यह धारणा हमारे भीतर बैठ जाती है कि जब तक बैंक अकाउंट में पर्याप्त पैसा न हो, तब तक कोई बड़ा सपना शुरू ही नहीं किया जा सकता।
लेकिन बिज़नेस की दुनिया की सच्चाई अक्सर उन धारणाओं से बिल्कुल अलग होती है जो दूर से दिखाई देती हैं। कई बार सबसे मजबूत कंपनियाँ उन लोगों द्वारा बनाई जाती हैं जिन्होंने शुरुआत किसी बड़े निवेश से नहीं, बल्कि एक छोटे से अवसर, सही सोच और लगातार काम करते रहने की आदत से की होती है। ऐसे लोगों की कहानियाँ हमें यह समझाती हैं कि पूंजी महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन किसी भी उद्यम की असली नींव उसका दृष्टिकोण, निर्णय लेने की क्षमता और कठिन समय में टिके रहने का साहस होता है।
The Founder’s Dream के इस एपिसोड में Kara Hotels के फाउंडर पुनीत सेठी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह सिर्फ होटल इंडस्ट्री में सफलता हासिल करने वाले एक उद्यमी की कहानी नहीं है, बल्कि उस सोच की कहानी है जिसने कई असफलताओं, अनिश्चितताओं और संघर्षों के बीच भी अवसरों को पहचानना नहीं छोड़ा। एक ऐसे उद्यमी की कहानी, जिसने बिना पूंजी के शुरुआत की, कोविड जैसी अभूतपूर्व चुनौती के बीच नया रास्ता खोजा और कुछ ही वर्षों में एक उभरती हुई हॉस्पिटैलिटी ब्रांड खड़ी कर दी।
दिलचस्प बात यह है कि होटल इंडस्ट्री पुनीत की पहली उद्यमी यात्रा नहीं थी। होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के बावजूद उन्होंने सीधे होटल व्यवसाय में कदम नहीं रखा। उन्होंने अलग-अलग कंपनियों में काम किया, कॉर्पोरेट दुनिया को समझा और फिर खुद के व्यवसाय शुरू किए। इवेंट्स, एक्सपोर्ट, रिटेल और ई-कॉमर्स जैसे कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया।
सब कुछ सामान्य तरीके से आगे बढ़ रहा था, लेकिन फिर कोविड ने पूरी दुनिया की दिशा बदल दी। उनके कई व्यवसाय एक के बाद एक प्रभावित होने लगे। एक्सपोर्ट रुक गए, इवेंट इंडस्ट्री ठप हो गई और रिटेल स्टोर्स पर ताले लग गए। अधिकांश लोगों के लिए यह समय केवल संकट का था, लेकिन पुनीत के लिए यही समय एक नए अवसर की शुरुआत बन गया।
दरअसल कोविड आने से पहले ही वह होटल इंडस्ट्री को समझने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने सैकड़ों लोगों से मुलाकात की, इस सेक्टर के बिज़नेस मॉडल को समझा और संभावनाओं का अध्ययन किया। लेकिन सही अवसर नहीं मिल रहा था। फिर 2020 आया। होटल इंडस्ट्री सबसे बुरी तरह प्रभावित सेक्टर्स में से एक बन गई। बहुत से लोग इस क्षेत्र से बाहर निकलना चाहते थे। यहीं पर उन्हें वह अवसर दिखाई दिया, जिसे बाकी लोग समस्या के रूप में देख रहे थे। यही वह क्षण था जिसने Kara Hotels की नींव रखी।
यहाँ एक बहुत बड़ा बिज़नेस सबक छिपा हुआ है। अवसर हमेशा अच्छे समय में नहीं आते। कई बार अवसर वही होते हैं, जिनसे बाकी लोग डरकर भाग रहे होते हैं। उद्यमिता का असली खेल यही है कि आप परिस्थितियों को दूसरों से अलग नज़रिए से देख पाते हैं या नहीं।
आज पाँच वर्षों के भीतर Kara Hotels कई प्रॉपर्टीज़ के साथ एक उभरता हुआ ब्रांड बन चुका है। लेकिन जब उनकी यात्रा के बारे में बात होती है, तो वह किसी जादुई रणनीति या शॉर्टकट की बात नहीं करते। उनका पूरा दृष्टिकोण एक साधारण लेकिन बेहद शक्तिशाली विचार पर आधारित है; शुरुआत करो और लगातार काम करते रहो।
बातचीत के दौरान जब अभिषेक उनसे पूछते हैं कि कोई व्यक्ति बिज़नेस शुरू करना चाहता है तो उसे सबसे पहले किस चीज़ पर काम करना चाहिए; आइडिया, स्किल्स या पूंजी? तो उनका जवाब बहुत स्पष्ट होता है। उनके अनुसार पैसे की कमी कभी भी बिज़नेस शुरू न करने का कारण नहीं हो सकती।
वह अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि जब उन्होंने 2014 में व्यवसाय शुरू किया था, तब उनकी जेब में लगभग कुछ भी नहीं था। फिर भी उन्होंने शुरुआत की। उनका मानना है कि भारत जैसे देश में अवसरों की कमी नहीं है। समस्या अवसरों की नहीं, बल्कि कार्रवाई की है। लोग अक्सर सही समय, पर्याप्त पैसे और परफेक्ट प्लान का इंतज़ार करते रहते हैं। जबकि बिज़नेस की दुनिया में अधिकांश लोग सीखते भी चलते-चलते हैं और बढ़ते भी चलते-चलते हैं।
शायद इसी कारण वह बार-बार एक बात दोहराते हैं कि आइडियाज़ की दुनिया में कोई कमी नहीं है। हर व्यक्ति के पास किसी न किसी रूप में एक अच्छा विचार होता है। लेकिन व्यवसाय विचारों से नहीं, निष्पादन से बनते हैं। जो लोग शुरुआत कर देते हैं, वही धीरे-धीरे रास्ते भी खोज लेते हैं। जो केवल योजना बनाते रहते हैं, वे अक्सर योजना बनाने तक ही सीमित रह जाते हैं।
बातचीत का एक बेहद दिलचस्प हिस्सा पाँच सितारा होटलों को लेकर भी था। अक्सर लोग सोचते हैं कि आखिर कोई व्यक्ति एक कमरे के लिए हजारों या लाखों रुपये क्यों खर्च करता है। आखिर कमरे में ऐसा क्या अलग होता है?
इस सवाल का जवाब देते हुए पुनीत एक गहरी बात कहते हैं। उनके अनुसार ग्राहक केवल कमरा नहीं खरीदता, वह अनुभव खरीदता है। जैसे कोई व्यक्ति ₹250 की घड़ी और ₹25,000 की घड़ी दोनों में समय देख सकता है, लेकिन फिर भी लोग महंगी घड़ी खरीदते हैं क्योंकि वे केवल उत्पाद नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भावना, प्रतिष्ठा और अनुभव खरीद रहे होते हैं।
होटल इंडस्ट्री में भी यही बात लागू होती है। रिसेप्शन पर आपका स्वागत कैसे होता है, आपको कैसा महसूस कराया जाता है, कमरे तक पहुँचाने का अनुभव कैसा है, स्टाफ का व्यवहार कैसा है? यही छोटी-छोटी चीजें मिलकर प्रीमियम अनुभव बनाती हैं। अंततः लोग सुविधाओं के लिए नहीं, अनुभवों के लिए अतिरिक्त भुगतान करते हैं।
यहीं से बातचीत हॉस्पिटैलिटी के मूल तत्व तक पहुँचती है – इंसान। आज दुनिया तेजी से ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर बढ़ रही है। रोबोट्स, सेल्फ चेक-इन सिस्टम और ऑटोमेटेड सर्विसेज़ धीरे-धीरे कई उद्योगों का हिस्सा बन रही हैं। लेकिन पुनीत का मानना है कि हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में इंसान की जगह पूरी तरह कभी नहीं ली जा सकती।
लोग होटल के कमरे भूल सकते हैं, लेकिन उन्हें याद रहता है कि वहाँ उनका स्वागत कैसे हुआ था। उन्हें याद रहता है कि किसी कर्मचारी ने उनकी मदद कैसे की थी। उन्हें याद रहता है कि उन्होंने वहाँ कैसा महसूस किया था। यही कारण है कि उनके अनुसार तकनीक महत्वपूर्ण है, लेकिन हॉस्पिटैलिटी का मूल आधार हमेशा इंसान ही रहेगा।
उनकी यह सोच Kara Hotels के विज़न में भी दिखाई देती है। वह अपने होटलों को केवल रहने की जगह के रूप में नहीं देखते। उनका उद्देश्य ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ मेहमान खुद को घर से दूर नहीं, बल्कि घर के विस्तार में महसूस करें। जब कोई ग्राहक होटल छोड़ते समय यह कहता है कि यहाँ बिल्कुल घर जैसा माहौल था, तो वह इसे अपने व्यवसाय की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
पूरी बातचीत में एक और विषय बार-बार सामने आता है; किस्मत और मेहनत का संबंध। सफलता की चर्चा होते ही यह सवाल लगभग हर जगह पूछा जाता है कि आखिर बड़ा योगदान किसका होता है।
पुनीत इस प्रश्न का जवाब बहुत संतुलित तरीके से देते हैं। उनके अनुसार मेहनत अनिवार्य है, लेकिन यह मान लेना भी गलत होगा कि किस्मत की कोई भूमिका नहीं होती। वह अक्षय कुमार का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि मेहनत के साथ-साथ सही समय पर सही जगह पहुँचना भी उनकी सफलता का एक कारण रहा। पुनीत मानते हैं कि किस्मत का दरवाज़ा उन्हीं लोगों के लिए खुलता है जो लगातार प्रयास कर रहे होते हैं। जो लोग बैठे रहते हैं, उनके लिए किस्मत भी बहुत कम कर पाती है।
शायद यही कारण है कि जब वह अपने शुरुआती उद्यमी दिनों को याद करते हैं, तो बिना किसी झिझक के स्वीकार करते हैं कि पहले कुछ साल बेहद कठिन थे। कई बार ऐसा समय आया जब यह भी स्पष्ट नहीं होता था कि आगे क्या होगा। कई बार उन्होंने व्यवसाय छोड़ने के बारे में सोचा। कई बार लगा कि शायद उद्यमिता उनके लिए बनी ही नहीं है। लेकिन हर बार किसी न किसी रूप में एक नई संभावना सामने आ गई और सफर आगे बढ़ता रहा।
आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिस पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं था। शायद इसी कारण वह कहते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ इंसान समझने लगता है कि वह सब कुछ अकेले नहीं कर रहा था; बहुत सी चीजें उसे करवायी भी जा रही थीं।
बातचीत के दौरान उनके बचपन की एक घटना भी सामने आती है जो उनकी उद्यमी सोच को समझने में मदद करती है।
स्कूल के दिनों में जब शिक्षक बच्चों से पूछते थे कि बड़े होकर क्या बनना चाहते हो, तब अधिकांश बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बनने की बात करते थे। पुनीत के मन में उस समय से ही व्यवसाय करने का विचार था, लेकिन वह उसे बोल नहीं पाए। उन्हें लगा कि शायद यह जवाब देने में संकोच होगा, इसलिए उन्होंने भी डॉक्टर बनने की बात कह दी। लेकिन उनके भीतर जो बीज उस समय लगा था, वह कभी खत्म नहीं हुआ। बिज़नेस करने की इच्छा उनके साथ बनी रही और समय आने पर वही इच्छा वास्तविकता में बदल गई।
यहाँ से बातचीत जीवन के एक और महत्वपूर्ण विचार तक पहुँचती है- मंज़िल और सफर का अंतर। अधिकांश लोग लक्ष्य तय करते हैं और फिर पूरी ऊर्जा केवल मंज़िल तक पहुँचने में लगा देते हैं। लेकिन पुनीत का मानना है कि अगर आप केवल लक्ष्य पर ध्यान देंगे तो रास्ते की हर समस्या बोझ लगने लगेगी। इसके विपरीत अगर आप सफर का आनंद लेना सीख जाते हैं, तो वही समस्याएँ सीखने और आगे बढ़ने का हिस्सा बन जाती हैं। उनके अनुसार सफलता केवल मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं है, बल्कि उस यात्रा का नाम है जिसे आप रोज़ जीते हैं।
बिज़नेस को लेकर उनका सबसे अलग विचार शायद पैसे के बारे में है। आज अधिकांश लोग बिज़नेस को सीधे पैसे से जोड़कर देखते हैं। लेकिन पुनीत का मानना है कि पैसा कभी भी व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
वह एक रोचक उदाहरण देते हैं। दूध से पनीर और घी बनता है। बाजार में सबसे अधिक मूल्य घी का होता है, लेकिन मूल उत्पाद घी नहीं बल्कि दूध होता है। उसी तरह व्यवसाय में भी पैसा सबसे अधिक दिखाई देने वाली चीज़ है, लेकिन असली उत्पाद पैसा नहीं है। असली उत्पाद वह मूल्य है जो आप पैदा करते हैं, वह प्रभाव है जो आप समाज पर छोड़ते हैं और वह समस्या है जिसे आप हल करते हैं। जब कोई व्यवसाय इस सोच के साथ बनाया जाता है, तब पैसा उसके पीछे-पीछे आता है।
शायद यही सोच उन्हें भारत की सबसे बड़ी होटल चेन बनाने का सपना देखने की ताकत देती है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उनकी महत्वाकांक्षा केवल होटलों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। वह एक ऐसा ब्रांड बनाना चाहते हैं जो पाँच सितारा सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाए, लोगों को बेहतर अनुभव दे और भारतीय हॉस्पिटैलिटी की उस परंपरा को आगे बढ़ाए जिसके लिए दुनिया भारत को पहचानती है।
इस पूरे एपिसोड को सुनने के बाद एक बात बहुत स्पष्ट हो जाती है। बिज़नेस केवल पूंजी का खेल नहीं है। यह दृष्टिकोण, धैर्य, लगातार सीखने की क्षमता और अवसरों को पहचानने की कला का खेल है। कई बार सबसे बड़ी सफलताएँ वहीं जन्म लेती हैं जहाँ बाकी दुनिया केवल समस्याएँ देख रही होती है। और शायद यही पुनीत सेठी की यात्रा का सबसे बड़ा संदेश भी है; शुरुआत करने के लिए परफेक्ट समय का इंतज़ार मत कीजिए। क्योंकि कई बार रास्ता चलने के बाद ही दिखाई देता है।
पूरा पॉडकास्ट यहाँ देखिये :-