मनुष्य का सबसे बड़ा भय मृत्यु नहीं है। उसका सबसे बड़ा भय है किसी अपने को खो देना। शायद यही कारण है कि जैसे जैसे किसी व्यक्ति के प्रति हमारा प्रेम गहरा होता जाता है, उसके खो जाने का डर भी उतना ही बढ़ने लगता है।
खोने का भय आखिर पैदा क्यों होता है?
यह सोचने वाली बात है कि यदि प्रेम इतनी सुंदर अनुभूति है, तो उसके भीतर इतनी बेचैनी, असुरक्षा और पीड़ा क्यों छिपी होती है। लेकिन यहाँ एक बहुत सूक्ष्म अंतर समझना आवश्यक है। कई बार जिसे हम प्रेम समझते हैं, वह वास्तव में प्रेम नहीं, बल्कि आसक्ति होती है। और आसक्ति का स्वभाव ही भय पैदा करना है।
प्रेम और आसक्ति देखने में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन दोनों की दिशा बिल्कुल अलग होती है। प्रेम स्वतंत्र करता है, जबकि आसक्ति बाँधती है। प्रेम में स्वीकार होता है, जबकि आसक्ति में नियंत्रण की इच्छा छिपी होती है।
जैसे ही किसी व्यक्ति के साथ “मेरा” शब्द जुड़ता है, मन उसके भीतर स्थायित्व खोजने लगता है। मेरी माँ, मेरा साथी, मेरा मित्र: इन शब्दों के पीछे केवल संबंध नहीं होते, बल्कि हमारी मानसिक सुरक्षा भी जुड़ी होती है। धीरे धीरे हमारी पहचान, हमारी भावनात्मक स्थिरता और हमारा सुख उस व्यक्ति की उपस्थिति पर टिकने लगते हैं। अब उसका दूर जाना केवल किसी व्यक्ति का जाना नहीं रह जाता, बल्कि ऐसा महसूस होने लगता है मानो हमारे भीतर का कोई हिस्सा टूट रहा हो। यहीं से भय जन्म लेता है।
क्या दर्द वास्तव में प्रेम का हिस्सा है?
यदि हम ईमानदारी से अपने दुख को देखें, तो पाएँगे कि वियोग का बड़ा हिस्सा वास्तव में हमारे अपने अनुभवों की हानि से जुड़ा होता है। जब कोई अपना दूर चला जाता है, तो मन बार बार उन्हीं यादों में लौटता है जो अब दोबारा कभी नहीं दोहराई जाएँगी। हमें उस व्यक्ति की उपस्थिति के साथ जुड़ी हुई सुरक्षा, परिचय और भावनात्मक सहारे का शोक होता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा प्रेम झूठा था, बल्कि यह कि प्रेम के भीतर स्वामित्व की भावना प्रवेश कर चुकी थी। और जहाँ स्वामित्व आता है, वहाँ भय अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि हर वह चीज़ जिसे हम पकड़कर रखना चाहते हैं, समय के साथ बदलने वाली है।
सच्चा प्रेम स्वामित्व नहीं, उपस्थिति है
यही कारण है कि आसक्ति हमेशा परिवर्तन से डरती है। उसे समय शत्रु लगता है, क्योंकि समय हर उस चीज़ को बदल देता है जिसे मन स्थायी बनाना चाहता है। लेकिन प्रेम का स्वभाव बिल्कुल अलग है। प्रेम किसी आत्मा का स्वामित्व नहीं चाहता: वह केवल उसकी उपस्थिति का अनुभव करना चाहता है। वह पकड़ता नहीं, केवल स्वीकार करता है।
आसक्ति कहती है: “तुम मेरे हो।” प्रेम कहता है: “तुम मेरे जीवन में आए, यही पर्याप्त है।” यह समझना आसान है, लेकिन जीना कठिन, क्योंकि मनुष्य का पूरा मानसिक ढाँचा पकड़ और पहचान पर आधारित है। हम संबंधों को अनुभव की तरह नहीं, संपत्ति की तरह जीने लगते हैं। और जिस चीज़ को संपत्ति बना दिया जाए, उसके खोने का भय कभी समाप्त नहीं होता।
इसी भय से ईर्ष्या जन्म लेती है, नियंत्रण की इच्छा पैदा होती है, तुलना शुरू होती है और असुरक्षा बढ़ती जाती है। धीरे धीरे प्रेम धुएँ से भर जाता है। वास्तव में प्रेम अग्नि की तरह है। उसमें ऊष्मा है, प्रकाश है, जीवन है। लेकिन आसक्ति उसी अग्नि से उठने वाला धुआँ है। जब हम धुएँ को ही प्रेम समझ लेते हैं, तब हमें प्रेम खतरनाक लगने लगता है। हम कहते हैं कि प्रेम दुख देता है, जबकि दुख वास्तव में उस पकड़ से पैदा होता है जिसके द्वारा हम प्रेम को स्थायी बनाना चाहते हैं।
लेकिन यहाँ एक और गहरी बात छिपी हुई है। मनुष्य सीधे परिपक्व प्रेम तक नहीं पहुँचता। वह पहले आसक्ति से होकर गुजरता है। जैसे एक बच्चा पहले गिरना सीखता है और फिर चलना, वैसे ही मनुष्य पहले दूसरे लोगों के सहारे अपने भीतर की अधूरी जगहों को भरने की कोशिश करता है। वह मानता है कि दूसरा व्यक्ति ही उसके सुख का स्रोत है, वही उसे पूर्ण बना सकता है। फिर जीवन धीरे धीरे इस भ्रम को तोड़ता है। टूटे हुए रिश्ते, ईर्ष्या, असफल प्रेम, अकेलापन और वियोग: ये सब दंड नहीं हैं। ये उद्घाटन हैं। ये हमें दिखाते हैं कि हमने अपनी पूर्णता किसी और के हाथों में सौंप दी थी।
प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, केवल रूप बदलता है
यदि मनुष्य इन अनुभवों से भागने के बजाय उन्हें समझने का साहस करे, तो वह एक गहरे सत्य तक पहुँच सकता है। वह देखना शुरू करता है कि प्रेम कभी बाहर था ही नहीं। दूसरा व्यक्ति प्रेम का स्रोत नहीं था: वह केवल एक माध्यम था जिसके द्वारा हमारे भीतर छिपा प्रेम प्रकट हुआ। जिस ऊष्मा, अपनापन और जीवंतता को हम दूसरे में खोज रहे थे, उसका मूल हमेशा हमारे भीतर था। यही समझ परिपक्वता की शुरुआत है।
तब प्रेम स्मृतियों में नहीं जीता, वर्तमान में जीता है। तब कोई रिश्ता समाप्त हो सकता है, लेकिन प्रेम समाप्त नहीं होता। शरीर बदल सकते हैं, भूमिकाएँ बदल सकती हैं, लोग दूर जा सकते हैं; लेकिन प्रेम करने की क्षमता बनी रहती है, क्योंकि वह किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं, हमारे अस्तित्व का स्वभाव है।
और शायद यहीं आकर मनुष्य का प्रश्न भी बदल जाता है। वह यह पूछना बंद कर देता है कि “यदि सब कुछ एक दिन खो जाना है, तो प्रेम का क्या अर्थ है?” क्योंकि तब उसे समझ आने लगता है कि खोता केवल स्वरूप है, प्रेम नहीं। प्रेम कभी समाप्त नहीं होता। समाप्त केवल वह रूप होता है, जिससे हम उसे बाँध देना चाहते थे।