हम अक्सर प्रेम को किसी दूसरे व्यक्ति से जुड़ी हुई भावना मानते हैं। हमें लगता है कि प्रेम तब शुरू होता है, जब कोई हमें समझने लगे, स्वीकार करने लगे, हमारे भीतर की खाली जगहों को भर दे। लेकिन शायद प्रेम की शुरुआत वहाँ से नहीं होती। शायद प्रेम की शुरुआत उस क्षण से होती है, जब मनुष्य अपने भीतर चल रहे युद्ध को समाप्त कर देता है।
सच्चे प्रेम की शुरुआत कहाँ से होती है
जब वह अपने ही कुछ हिस्सों को स्वीकार करना और कुछ हिस्सों को नकारना बंद कर देता है। क्योंकि जो व्यक्ति अपने भीतर के अंधेरे से डरता है, वह दूसरे के अंधेरे से भी डरता है। जो अपनी कमियों को स्वीकार नहीं कर पाता, वह अपने प्रियजनों से पूर्णता की उम्मीद करने लगता है। और जहाँ अपेक्षाएँ पूर्णता की माँग करने लगती हैं, वहाँ संबंध धीरे धीरे संघर्ष में बदलने लगते हैं।
लेकिन जैसे ही मनुष्य स्वयं को पूरी तरह स्वीकार करना शुरू करता है, एक गहरा परिवर्तन होता है। तब प्रेम माँगना बंद हो जाता है। तब प्रेम किसी से प्राप्त करने वाली वस्तु नहीं रह जाता। वह स्वयं व्यक्ति की अवस्था बन जाता है।
फिर प्रेम केवल संबंध नहीं रहता। वह एक ऊर्जा बन जाता है, जो व्यक्ति के भीतर से स्वाभाविक रूप से बहती है। वह किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। वह किसी उपस्थिति पर निर्भर नहीं रहता। वह तब भी बना रहता है, जब आसपास कोई न हो।
यहीं से सच्चे प्रेम की शुरुआत होती है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य की इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं। आजकल आध्यात्मिकता के नाम पर लोगों को यह सिखाया जाता है कि इच्छाएँ रखना गलत है, जरूरतें रखना कमजोरी है। जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। अपनी भावनाओं और जरूरतों को दबाना प्रेम नहीं, बल्कि स्वयं के विरुद्ध हिंसा है।
मनुष्य होने का अर्थ ही है संवेदनाएँ होना, जरूरतें होना, जुड़ाव महसूस करना।
समस्या इच्छाओं में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब व्यक्ति प्रेम पाने के लिए स्वयं को छोड़ना शुरू कर देता है। जब वह अपनी आवाज़ दबाने लगता है। जब वह केवल स्वीकार किए जाने के लिए वह बनने लगता है, जो वास्तव में वह है ही नहीं।
अधिकांश लोग प्रेम की खोज स्वयं को खोकर शुरू करते हैं। बचपन से उन्हें बताया जाता है कि वे बहुत ज्यादा संवेदनशील हैं, बहुत ज्यादा भावुक हैं, बहुत ज्यादा जिद्दी हैं। धीरे धीरे वे अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाना सीख जाते हैं। वे अपने भीतर की सच्चाई को दबा देते हैं ताकि लोग उन्हें स्वीकार कर लें। लेकिन जिस क्षण मनुष्य स्वयं को छोड़ देता है, उसी क्षण उसके संबंधों में भी छोड़ दिए जाने का भय जन्म लेने लगता है।
जीवन बाहर वही दिखाने लगता है, जो भीतर चल रहा होता है।
इसीलिए कई बार विश्वासघात और टूटन के बाद व्यक्ति प्रेम से नहीं, स्वयं से कट जाता है। वह लोगों को दोष देने लगता है। उसे हर जगह केवल धोखा दिखाई देता है। उसका पूरा वर्तमान अतीत की चोटों के इर्द गिर्द घूमने लगता है। फिर वह अपने हृदय के चारों ओर दीवारें बना लेता है।
लेकिन उपचार अकेलेपन में नहीं होता। उपचार तब शुरू होता है, जब व्यक्ति पहली बार अपने भीतर की आवाज़ सुनना शुरू करता है। जब वह यह समझने लगता है कि जीवन भर वह दूसरों को खुश करने में इतना व्यस्त था कि उसने कभी यह जाना ही नहीं कि वास्तव में वह स्वयं क्या चाहता है। धीरे धीरे क्रोध शांत होने लगता है। पीड़ा बैठने लगती है। और उसी शांति से स्पष्टता जन्म लेती है।
जब प्रेम भय से स्वतंत्र हो जाता है
मनुष्य समझने लगता है कि प्रेम की शुरुआत आत्म स्वीकृति से होती है। और आत्म स्वीकृति का अर्थ केवल अपनी अच्छाइयों को स्वीकार करना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी इच्छाओं, कमियों, कमजोरियों और अपूर्णताओं को भी सम्मान देना। लेकिन यह सत्य केवल संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता।
तुम प्रेम में सच्चे नहीं हो सकते, यदि तुम्हारा पूरा जीवन झूठ पर खड़ा हो। तुम अपने हृदय की आवाज़ संबंधों में नहीं सुन सकते, जबकि तुम्हारा काम, तुम्हारी जीवनशैली और तुम्हारे निर्णय लगातार तुम्हारी आत्मा को थका रहे हों।
यहीं से जीवन का अगला चरण शुरू होता है।
मनुष्य धीरे धीरे उन चीज़ों को छोड़ना शुरू करता है, जो उसके लिए बनी ही नहीं थीं। वह समाज के तय किए हुए साँचे से बाहर निकलना शुरू करता है। वह केवल व्यावहारिक दिखने वाले जीवन को जीना बंद कर देता है। अब वह मन से नहीं, हृदय से निर्णय लेने लगता है।
और यहीं एक अद्भुत परिवर्तन होता है।
अब उसे हर चीज़ के पीछे भागना नहीं पड़ता। लोग, अवसर, संबंध, अनुभव : सब धीरे धीरे उसकी ओर आने लगते हैं। क्योंकि पहली बार उसका बाहरी जीवन उसके भीतर की सच्चाई से मेल खाने लगता है।
बहुत से लोग इसी अवस्था को “सोलमेट” मिलने जैसा अनुभव कहते हैं। लेकिन प्रेम की यात्रा यहाँ भी समाप्त नहीं होती।
क्योंकि चाहे कोई तुम्हें कितना भी समझ ले, चाहे कोई तुम्हें पूरी तरह स्वीकार कर ले, भीतर एक गहरी खाली जगह फिर भी बनी रह सकती है। क्योंकि जब तक तुम्हारी पहचान किसी दूसरे व्यक्ति के सहारे टिकी हुई है, तब तक भीतर विभाजन बना रहेगा।
तब प्रेम भी एक सहारा बन जाता है। और जहाँ सहारा है, वहाँ भय अवश्य होगा।
यहीं से मनुष्य पहली बार यह समझना शुरू करता है कि कोई दूसरा व्यक्ति उसे पूर्ण नहीं कर सकता। इसलिए नहीं कि दूसरा व्यक्ति पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह स्वयं कभी अपूर्ण था ही नहीं।
पूर्णता किसी दूसरे से प्राप्त नहीं होती। वह भीतर पहचानी जाती है।
प्रेम अपने सबसे गहरे स्तर पर पहचान है। एक चेतना का दूसरी चेतना में स्वयं को पहचान लेना। वहाँ न कोई मालिक होता है, न कोई अधिकार। वहाँ केवल प्रेम होता है, जो स्वयं को हर रूप में अनुभव कर रहा होता है।
इसीलिए सच्चा प्रेम खतरनाक लगता है। क्योंकि उसमें नियंत्रण नहीं होता। उसमें शर्तें नहीं होतीं। उसमें स्थायित्व की गारंटी नहीं होती। उसे बाँधा नहीं जा सकता।
वह स्वतंत्र होता है। और जब प्रेम भय, खालीपन और पहचान बचाने का माध्यम नहीं रह जाता, तब वह कुछ और बन जाता है। वह प्रकाश बन जाता है। वह सुगंध बन जाता है। वह बिना किसी कारण के बहता है। वह तब भी बना रहता है, जब सामने कोई न हो। क्योंकि उसका स्रोत कोई व्यक्ति नहीं होता। उसका स्रोत स्वयं अस्तित्व होता है।
शायद यही आत्मा की पूरी यात्रा है। आसक्ति से स्वीकृति तक। भय से स्वतंत्रता तक। अधूरेपन से उस अनुभूति तक, जहाँ मनुष्य पहली बार समझता है कि प्रेम कहीं बाहर नहीं था।
वह हमेशा से उसके भीतर था।